फिल्म: परदे पर राम राज्य की वापसी

अयोध्या में राम लल्ला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद हर जगह राम नाम ही गूँज रहा है। कुछ दिन पहले राम मंदिर में राग सेवा का 45 दिवसीय कार्यक्रम पूरा हुआ,  जिसमें देश भर के दिग्गज कलाकारों  ने राम लल्ला के सेवा में कालार्पण किया। डाक विभाग ने राम मंदिर के नए स्टाम्प भी जारी किए हैं। 

टेलीविज़न भी राम भक्ति रस से परिपूर्ण हो रहा है। दूरदर्शन पर जनवरी में रामचरित मानस के चौपाइयों का गायन आयोजित किया गया। प्रतिदिन प्रातः दूरदर्शन पर राम लल्ला की आरती का सीधा प्रसारण हो है। नया साल शुरू होते ही सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन ने श्रीमद रामायण नामक एक नए धारावाहिक का प्रसारण शुरू किया जिसका निर्माण सिद्धार्थ कुमार तेवरी ने किया है। दूरदर्शन और शेमारू टीवी पर रामानंद सागर के रामायण का पुनः प्रसारण भी शुरू हुआ। पर मज़े की बात यह है की रामायण ने तो अभी अंगड़ाई ली है। आने वाले समय में बड़े और छोटे परदे पर रामायण बनाने की योजनाएं बन रहीं हैं।

 पिछले साल रामायण पर आधारित ओम राउत की आदिपुरुष बॉक्स ऑफिस पर असफल रही और इसे दर्शकों और विशेषज्ञों की आलोचना का सामना करना पड़ा। इस साल नितेश तिवारी रणबीर कपूर को लेकर एक रामायण बना रहे हैं जिसकी कास्टिंग अभी पूरी नहीं हुई है। दूरदर्शन पर भी एक नया रामायण धारावाहिक प्रसारित होने वाला है। पर इनमें से कितने दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब रहेंगे, यह अब चर्चा का विषय बनता जा रहा है। 

सागर में उमड़ा राम का ज्वार

इस बात को कोई नकार नहीं  सकता की १९८७ में दूरदर्शन पर रामानंद सागर के रामायण के प्रसारण का भारत की राजनीती पर गहरा प्रभाव पड़ा। कहने वाले तो कहते हैं की इस सीरियल से मंदिर आंदोलन को नयी ऊर्जा मिली थी। रामायण के प्रसारण के बाद राजीव गाँधी सरकार की देख रेख में अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हुआ और १९९० में लाल कृष्णा अडवाणी का राम रथ सोमनाथ से अयोध्या की और चल पड़ा। रथ अयोध्या तो नहीं पहुंची मगर छह साल बाद भाजपा ने केंद्र में पहली बार अपनी सरकार बनायी। 

नए दौर का रामायण  

मुंबई में सागर आर्ट्स के दफ्तर में काफी चहल पहल है। साल १९८७ में रामायण बनाने के बाद २००८ में रामानंद सागर के पुत्र आनंद सागर ने एन डी टी वी इमेजिन के लिए रामायण बनाया था जो काफी चर्चा में रही। अब १६ साल बाद रामानंद सागर के पौत्र और प्रेम सागर के पुत्र शिव सागर दूरदर्शन के लिए रामायण बना रहे हैं। मुंबई में सागर आर्ट्स के दफ्तर में  शिव अपने नए सीरियल के कास्टिंग में व्यस्त हैं। शिव मानते हैं कि हर पीढ़ी कला से कुछ अलग चाहती है और ऐसे में नई पीढ़ी के लिए एक नए रामायण का निर्माण होना चाहिए। “मगर सही कलाकार चुनना बहुत ज़रूरी है। हम एकदम नए चेहरे खोज रहें हैं जो राम और सीता के किरदारों के साथ न्याय कर सकें और वाल्मीकि के विवरण से थोड़ा मेल खाएँ।”

शिव का मानना है की आज पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियों में युवा रुचि ले रहा है। “लोग अपने जड़ों की खोज कर रहें है और यह जानने के लिए इच्छुक हैं कि हम वास्तव मैं कौन हैं, कहाँ से आएं हैं, हमारे मूल्य और पहचान क्या है। इन सब बातों से एक पीढ़ी को रूबरू कराने के लिए रामायण से ज़्यादा उपयुक्त अन्य कोई माध्यम नहीं।”

शिव के लिए सब से बड़ी चुनौती यही है कि लोग उनके दादा रामानंद सागर के रामायण को एक मापदंड समझते हैं। “हम दादाजी के रामायण का मुक़ाबला नहीं कर रहे हैं; वह तो एक  उत्कृष्ट रचना है । हम कम्बन, तुलसीदास, वाल्मीकि, रंगनाथ आदि कई कवियों के रामायणों से चुनकर कुछ अनसुनी कहानियां लोगों के सामने रख रहे हैं। और इसे हम काकभुशुण्डि के दृष्टिकोण से बता रहे हैं। काकभुशुंडि अनन्य राम भक्त है जो जो कौवे के रूप में गरुड़ को रामायण की कहानी सुनाते हैं। आज हम टाइम ट्रेवल और मल्टीवर्से की बातें करते हैं मगर ये विचार हम अपनी धर्म ग्रंथों में देख सकते हैं।  काकभुशुण्डि ने कई बार रामायण को घटते देखा है और हर बार कुछ न कुछ अलग हुआ है।” 

विचार विमर्श 

रामायण के विशेषज्ञ बस इतना चाहते है कि जो भी बने तथ्यों के आधार पर बने और रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर कुछ अनर्थ न बना डाले। बैंगलोर से थोड़ी दूर रागिहल्ली गाओं में स्थित वाल्मीकि आश्रम चलाने वाले डॉ. आर. रंगन वाल्मीकि रामायण के विशेषज्ञ हैं और मानते हैं कि रामायण बनाने वाले फिल्मकार तीन प्रकार के होते हैं।  

“एक, जिन में राम के प्रति श्रद्धा है और वे पूरा प्रयास करते हैं कि राम कथा के साथ न्याय हो, जैसे रामानंद सागर थे। दूसरे वे होते हैं जो सोचते हैं कि राम की एक लहर चल पड़ी है तो कुछ बना कर चार पैसे कमाते हैं। आदिपुरुष इस वर्ग में आता है। तीसरी श्रेणी के लोग राम कथा कहने के बहाने राम की बदनामी करने की कोशिश करते हैं और मुख्य तौर पर एक एजेंडा पूरा करने के लिए फिल्म या सीरियल बनाते हैं। इन में से कुछ लेखक समुदाय के हैं जो रामायण को ठीक से समझे बिना ही अपनी कल्पना की उड़ान भरते हैं और कुछ भी अर्थहीन लिख देते हैं।”

डॉ रंगन के हिसाब से रामायण को बनाने के कुछ उल्लेखनीय प्रयास रहे हैं, जैसे १९९३ में आयी यूगो साको द्वारा निर्देशित एनीमेशन फिल्म रामायण: दी लेजेंड ऑफ़ प्रिंस राम, जिसको भारत और जापान ने साथ में बनाया था। “उन्होंने काफी हद तक  वाल्मीकि रामायण को ही आधार बनाया था। फिर कुछ साल पहले यशोदीप देवधर ने २१ नोट्स वाल्मीकि रामायण बनाया था जो काफी अच्छी बानी थी। रामानंद सागर ने अपने सीरियल में तुलसी रामायण को लेकर अच्छा काम किया था और वह स्वयं उस परंपरा से जुड़े हुए थे। सच तो यह है की सागर से पहले सब यही कहते थे की रामायण जैसे विषय पर आज के ज़माने में कोई रुचि नहीं लेगा।  पर उन्होंने रामायण बनाकर धार्मिक धारावाहिकों का एक बड़ा ट्रेंड शुरू किया था। आज लोग रामायण तो बनाने को तैयार है मगर वाल्मीकि को आधार नहीं बनाना चाहते।  उनको लगता है कि जब तक इस कथा में कुछ मसाला न जोड़ा जाए तब तक लोग नहीं देखेंगे। पर सच तो यह है की आधुनिक युग के लिए वाल्मीकि से ज़्यादा और कोई रामायण उपयुक्त नहीं।”

सिनेमा और रामायण 

राम कथा को कई बार परदे पर उतारा जा चूका है। साल 1917 में दादासाहेब फाल्के ने फिल्म लंका दहन बनायीं थी जो रामायण के सुन्दर कांड पे आधारित थी। चालीस के दशक में विजय भट्ट ने रामायण के ऊपर कई कामयाब फ़िल्में बनायीं, जैसे भारत मिलाप (१९४२), राम राज्य (१९४३) और राम बाण (१९४८)। इन तीनो फिल्मों में राम और सीता की भूमिका में दिखने वाले प्रेम अदीब और शोभना समर्थ को दर्शकों का ढेर सारा प्यार मिला और जहाँ जहाँ वे गए, वहाँ उनमें लोगों को सिया राम की ही छवि दिखी। साठ  के दशक में संपूर्ण रामायण (१९६१) और श्री राम भारत मिलान (१९६५) जैसी फिल्मों में महिपाल और अनीता गुहा लोगों के बीच राम और सीता बनकर आए थे। 

 कई सालों बाद १९८७ में रामानंद सागर के रामायण में सीता राम की भूमिका में दिखने वाले दीपिका और अरुण गोविल में आज भी लोग ईश्वर की छवि देखते हैं और ये  कलाकार भी अपनी छवि बनाए रखने के वास्ते ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचे। पर क्या आज के रामायण के अभिनेता ऐसा कर पाएंगे?

दक्षिणा पथ 

कला समीक्षक विजय साई कहते हैं आज के तारीख में अपनी छवि बनाए रखने और भी मुश्किल है क्यूंकि यह सोशल मीडिया का युग है। “पहले कलाकार अपनी छवि को लेकर काफी सचेत थे। वे किरदार भी ऐसे चुनते ते जिससे उस छवि को कोई हानि न पहुँचे। हर बड़ा कलाकार यह चाहता था कि वह कुछ ५-१० फिल्में ऐसी करे जिसके लिए उसे मरणोपरांत भी याद रखा जाए। और उनकी तैयारी भी अलग किस्म की होती थी”।

शायद हिन्दुस्तानी सिनेमा में तेलुगु इंडस्ट्री से बेहतर पौराणिक कथाओं को पर्दे पर किसी ने शायद ही उतारा होगा। विजय इसका श्रेय उस ज़माने के  तेलुगु रंग मंच को देते हैं, जहाँ से तैयार होकर ये कलाकार निकलते थे। “मंच में उनको लम्बे डायलॉग्स और पद्य कंठस्त करने की शिक्षा मिलती थी। ये पौराणिक नाटक तेलुगु कवी पोतना के भागवत पे आधारित थे। जो कलाकार इसका मंचन करके तैयार होते थे, उनमें इन किरदारों की समझ भी बेहतरीन होती थी। इसीलिए एस. वी. रंगा राव, सावित्री और एन. टी. रामा राव जैसे कलाकार अपने किरदारों के लिए आज भी याद किए जाते हैं।  एन. टी. रामा राव ने न सिर्फ परदे पर राम और कृष्ण के किरदारों को निभाया पर लोगों ने उन में भगवान का रूप देखा।”

टॉकीज के आने के बाद इन्ही नाटकों का फिल्म रूपांतरण किया गया। कमलाकर कामेश्वर राव की फिल्में माया बाजार (१९५७), नर्तनशाला (१९६३), पांडव वनवासम (१९६५) और लव कुश (१९६३) का नाम आज भी बड़े आदर से लिया जाता है। “इन फिल्मों को लिखने वाले भी साहित्य के क्षेत्र में एक से बढ़कर एक महानुभाव थे। पौराणिक फिल्मों में संगीत का बड़ा योगदान है और इनके संगीतकार भी शास्त्रीय संगीत में पारंगत थे और जानते थे की कौनसे रस के लिए कौनसे राग उपयक्त होंगे।”

अब देखनी वाली बात यह है की आज के रामायण के अभिनेता काम करने के लिए कितना तैयार हैं। “जब रामानंद सागर ने रामायण बनाया उन्होंने अपने कलाकारों को दो साल के लिए सेट पे शाकाहारी आहार ही दिलवाया था। उससे भी बड़ी बात यह है कि  रामायण को बनाने के लिए एक पारदर्शिता की आवश्यकता है जो रामानंद सागर जैसे फिल्मकारों में थी।  इसलिए उनकी रामायण तकनीकी मानदंडों पे कालग्रस्त होने  के बावजूद कालजयी मानी जाती है। सच पूछिए तो हर दौर में रामायण होने चाहिए। ये हमारे देश की कहानियां और धरोहर है। पर बनाने वाले के विचार और इरादे नेक होने चाहिए। काम ऐसा होने चाहिए की विद्वान् भी खुश हो जाए और आम जनता भी उसे याद रखे। हमारे देश में कहानियों की कमी नहीं हैं,” विजय कहते हैं। 

आज के सिया राम 

बॉक्स ऑफिस विश्लेषक और कम्पलीट सिनेमा के सम्पादक अतुल मोहन को लगता है कि जिस लिहाज़ से फिल्म इंडस्ट्री ने तकनीकी क्षेत्र में प्रगति की है, काम तो बेहतरीन होना चाहिए। “काम अगर अच्छा हो तो लोग ज़रूर देखेंगे। टेक्नोलॉजी होने के बावजूद आदिपुरुष कुछ कमाल नहीं कर पाया। मैं तो मानता हूँ की रामायण एक परिचित कहानी होने पर भी लोग इसे बार बार देखेंगे अगर आप उसे एक दिलचस्प तरीके से पेश करेंगे। लोग अक्सर यह समझते हैं कि जो पौराणिक किरदार बहुत अच्छे से निभाते है, वे उसी छवि में बंध जाते हैं। आज भी हनुमान का ध्यान करें तो दारा सिंह का चेहरा सामने आता है। पर अभिनेता को पानी की तरह होना चाहिए। अरुण गोविल ने राम का किरदार करने से पहले राजश्री की कुछ फ़िल्में भी की थी पर रामायण के बाद वह जन मानस में राम बन गए।  क्या पता अगर रण्बीर कपूर की रामायण चल जाए तो लोग उसे राम समझने लगें! इसका जवाब तो सिर्फ समय दे सकता है।”

रामायण की बुनियाद 

पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियों पर जब काम होता है तो शोध का महत्त्व भी बढ़ जाता है। आज की तारीख में ऐसे प्रोग्राम विवादों के चुंगुल में भी आसानी से फँस सकते हैं। 

इसलिए डॉ रंगन का मानना है की रामायण जो भी बनाये, प्रामाणिक कथाओं के आधार पर बनाए और सब से उत्तम यही रहेगा कि वाल्मीकि को आधार बनाकर बनाये। 

“बाद के कवियों की रचनाएँ भक्ति प्रधान हैं। और वाल्मीकि ने जिस काल में इसे लिखा था तब काफी सारी सामाजिक बुराइयां नहीं आई थी। उदाहरण के लिए मैं ने किसी टी वी सीरियल में देखा था कि लंका में राक्षसियाँ रावण को सीता द्वारा भेजे गए कुछ उपहार प्रस्तुत करतीं हैं जिसमें कई श्वेत वस्त्र हैं। उपहार के माध्यम से सीता कह रहीं हैं कि  रावण के घर अब मातम का माहौल होगा और ये वस्त्र वहाँ काम आएंगे। अब वाल्मीकि के काल में विधवाओं का श्वेत वस्त्र पहनने का रिवाज था ही नहीं और बनाने वाले को यह शायद पता भी नहीं।”

वाल्मीकि रामायण के कुछ उल्लेखनीय कहानियों और संवादों से आज भी आम आदमी अनभिज्ञ है और उन्हें मूल कथाओं से परिचित होना चाहिए।   वाल्मीकि के काल के प्रगतिशील प्रथाओं का एक और उदाहरण डॉ रंगन देते हैं। “अयोध्या काण्ड के आरम्भ में कुछ रामायणों में ऐसा लिखा गया है कि दशरथ ने अपने पुरोहित से परामर्श कर के राम के राज्याभिषेक का निश्चय किया। परन्तु वाल्मीकि ने यह लिखा है की दशरथ ने प्रजा का मत जानकार राम को युवराज घोषित करने की निर्णय लिया। राजतंत्र के बीचों बीच वाल्मीकि लोकतंत्र की बात रख रहे हैं। इसी काण्ड में जब वनवास की घड़ी आती है, तो वशिष्ट यहाँ तक कहते हैं की वनवास केवल राम को हुआ है। सीता राम की आत्मा है। अतः सीता को सिंहासन पर बिठाकर पटरानी घोषित कर देना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है की अगर फिल्म निर्माता वाल्मीकि के पद चिन्हों पर चलेंगे तो आज के समाज के विचारों के अनुरूप एक फिल्म बना पाएंगे।”

आज के लेखक भी शायद वाल्मीकि के रामायण और उस समय के सामाजिक रीति रिवाजों से एकदम अनिभिज्ञ हैं। “इसीलिए वे लिखते वक़्त एक खिचड़ी बना रहे हैं जिसका वास्तविकता से कुछ लेना देना नहीं है। उदाहरण के तौर पर अमिष त्रिपाठी अपने किताब में लिखते हैं कि दशरथ कौशल्या से प्रेम इसलिए नहीं करते थे क्यूंकि जब राम का जन्म हुआ तब रावण के साथ दशरथ का युद्ध हुआ, जिसमें दशरथ पराजित हुए। ऐसी कोई घटना का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में नहीं है और न ही दशरथ अंधविश्वासी थे। उनके किताब में तो ऐसे भी प्रसंग है जिसमे वशिष्ट आश्रम में डेटिंग और गर्लफ्रेंड बनाने की बातें हो रही है। यह जब लेखक की कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं। और यदि बनाने वाले रचनात्मक स्वतंत्रता चाहते हैं तो यह अवश्य ध्यान में रखें कि कोई एजेंडा फैलाने के लिए रामायण एक बहाना न बन जाए।”

जहाँ डॉ रंगन सृजनात्मकता को अपनी जगह ठीक समझते हैं मगर यह भी खतरा देखते हैं कि जब लेखक प्रामाणिक ग्रंथों से हटकर कुछ बनाते हैं तो गलत संदेश लोगों तक पहुँच सकते हैं। “बी आर चोपड़ा की महाभारत काफी अच्छी बनी थी। पर उसमें यह दिखाया गया की दुर्योधन माया सभा में पानी में गिर जाता है और द्रौपदी उसका अपनमान करके हँसती है। वास्तव में व्यास ने ऐसा नहीं लिखा है। आप ऐसी कथाओं को आधार प्रदान करके एक किरदार की नीचता को न्यायसंगत बना रहे हैं।” 

राम आएंगे 

सागर आर्ट्स के लिए दूरदर्शन पे आने वाला रामायण एक तरह से घर वापसी है। शिव के अनुसार इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है कि वर्षों बाद वे फिर दूरदर्शन के साथ काम कर रहें हैं। “इसमें नास्टैल्जिया तो है ही पर हम इस बात को लेकर उत्सुक हैं कि हम इसे नई पीढ़ी के लिए बना रहें हैं। इसमें मूलतः भक्ति रस तो होगा ही और इसके लिए हम ख़ास तौर पर संगीत पर ध्यान दे रहें हैं। पापाजी  (रामानंद सागर) के रामायण में रविंद्र जैन जी ने चार चाँद लगा दिए थे। हम शोध और  प्रोडक्शन वैल्यू पे भी ध्यान दे रहें हैं और इस बात को भी मद्दे नज़र रख रहें हैं की तथ्यों के साथ कोई खिलवाड़ न हो। रामायण एक सीरियल नहीं है। यह भारत के हर घर और मंदिर से गूंजने वाली आस्था का प्रतीक है और लोग इसकी कहानी से परिचित हैं। पर राम के किरदार को पेश करना एक चुनौती अवश्य है। राम ने अपने आप को दशरथ का पुत्र माना; कभी अपने ईश्वरत्व को पूरी तरह नहीं जताया। राम और सीता के मानवीय मूल्यों का अन्वेषण कर उसे लोगों के बीच रखना एक बड़ा काम होगा। धार्मिक धारावाहिकों का निर्माण करते वक़्त पापाजी ने कुछ सिद्धांत अपनाये थे और हम उन सिद्धांतों का पालन करेंगे। हम इसे ऐसी कृति बनाएंगे कि परिवार की तीन पीढ़ियाँ साथ बैठ कर  इसको ख़ुशी से देख सकें।”

राम के किरदार के लिए एक अभिनेता ढूंढना कठिन है।  डॉ रंगन मानते हैं कि अरुण गोविल ने राम के शांत और प्रसन्न रूप को अच्छे से निभाया। “युद्ध के समय राम का एक रौद्र रूप भी है। वह रूप सच पूछिए तो राजामौली ने आर आर आर के क्लाइमेक्स में अच्छे से दर्शाया था और यही नहीं, आर आर आर मेरे अभिप्राय में वाल्मीकि रामायण के कथा के बिल्कुल करीब है।”

चुनावी साल में प्राण प्रतिष्ठा और राम मय वातावरण मात्र संयोग तो नहीं हो सकता। रामानंद सागर ने जब रामायण बनाया था तब भाजपा मॉक सभा में मात्र दो सीटों तक सीमित थी और आज भाजपा अपनी राजनैतिक पराकाष्ठा पर बैठी है और जिस उद्देश्य से लाल कृष्णा आडवाणी राम रथ पर बैठे थे, वह आज पूरा भी हो गया है। 

शिव सागर मानते हैं कि बतौर फिल्मकार उनका इस राजनीतिक पृष्ठभूमि से कोई लेना देना नहीं है। “पापाजी अगर चाहते तो राजनीती में प्रवेश कर सकते थे। पर वे एक राम भक्त थे और एक कलाकार थे। सनातन धर्म के मूल्यों को घर घर पहुँचाने में उनका बड़ा योगदान रहा है। पर उन्होंने कभी इसका श्रेय नहीं लिया। पापाजी ने हमेशा यही कहा की उन्होंने एक डाकिये का काम किया और किसी शक्ति ने उनसे यह काम करवाया।  रामायण उन्होंने अपने आदर्शों के लिए बनाया था। हम पापाजी के उन आदर्शों को ज़िंदा रखना चाहते हैं। और मैं मानता हूँ की दूरदर्शन एक सोता हुआ शेर है। समय आ गया है की यह अपनी शक्ति पहचाने और जाग जाए”।

(लेखक एक पत्रकार और फिल्म शोधकर्ता है)

A shorter version of this article was published in Outlook Hindi. You can read the version here.

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