हम हैं नए, अंदाज़ क्यों हो पुराना – 25 years of Dil Chahta Hai

आर्थिक सुधारों ने 1991 में देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं बदली, पूरी पीढ़ी की मानसिकता भी बदल डाली। उदारीकरण का असर जल्द ही आगामी दशक में आई फिल्मों पर दिखने लगा। बदलाव की पहली लहर हम आपके हैं कौन (1994) और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995) जैसी फिल्मों में दिखी। इन फिल्मों के पात्र जोश से भरे नए युग के थे, जो अपनी आजादी को संपूर्णता से अनुभव करना चाहते थे, पर फिर भी परंपराओं में निहित थे। मिलेनियल्स पीढ़ी अपनी यात्रा शुरू कर रही थी, जेन एक्‍स अपनी जगह लेने के लिए तैयार थे। आइटी और बीपीओ के क्षेत्र में हुई प्रगति से नए मध्यम वर्ग का विकास हुआ, जिसकी आमदनी बढ़ रही थी। रातोरात करोड़पति बनाने वाले (केबीसी) कार्यक्रम टेलीविजन पर छाने लगे थे। धारावाहिकों में शोर ज्‍यादा होने लगा था और फिल्मी पर्दे को ऋतिक रोशन से प्यार हो गया था। फिर भी 2001 में 90 के दशक के अभिनेताओं का रुतबा बुलंदी पर था।

नई सदी, नया रूप

नई सदी में भी हिंदी सिनेमा मेलोड्रामा से भरपूर था। 2001 में आई फिल्मों पर नजर डालें, तो अंदाजा हो जाएगा। शायद, उस वक्‍त लोगों को पुराने ढांचे की फिल्में ही ज्‍यादा पसंद आ रही थीं। साल की सबसे बड़ी हिट गदर एक प्रेम कथा थी जिसने लगभग 133 करोड़ रुपये कमाए। कभी खुशी कभी गम के साथ शाहरुख खान का जादू सर चढ़ कर बोलने लगा। आमिर खान की लगान के साथ भारतीय सिनेमा ने ऑस्कर पुरस्कार की दहलीज पर कदम रखा, दिल चाहता है ने वैश्वीकरण के बहाव में बदले हुए भारत का चेहरा उजागर किया।

फिल्म के निर्देशक फरहान अख्तर स्वयं इस वैश्वीकृत संस्कृति की उपज थे। दिल चाहता है के किरदार साउथ बॉम्बे के उच्च वर्ग के जरूर थे, मगर वे तेजी से आगे बढ़ते मध्यम वर्ग को भी संबोधित कर रहे थे। फरहान ऐसे दर्शकों को कहानी बता रहे थे जो रमेश सिप्पी के बुनियाद और रामानंद सागर की रामायण देख कर बड़े हुए थे, लेकिन अब वे नियमित रूप से स्टार वर्ल्ड पर फ्रेंड्स जैसे नवीनतम अंतरराष्ट्रीय शो भी देख रहे थे, जिसने शहरी दोस्ती को बहुत महत्व दिया। वे एमटीवी की भाषा बोलते थे। दिल चाहता है के किरदार भी काफी हद तक अंग्रेजी तौर-तरीकों में ढले थे।

कहने को दिल चाहता है की कहानी काफी सरल थी। स्कूल और कॉलेज की दोस्ती का सामना जब जिंदगी और समाज से होता है, तो हंसी-मजाक करने वाले लड़के भी गंभीर हो जाते हैं और अपने आप को बदलाव की कगार पर पाते हैं। इसके साथ बदलते हैं उनके रिश्ते। कुछ टूट जाते हैं और कुछ नए रिश्ते बनते हैं। बरसों के साथी कुछ ही बरसों में अजनबी बन जाते हैं। दिल चाहता है कि यौवन का मधुर समय भी ऐसा ही था, कभी न बीतने वाला। लेकिन सब बदलने लगता है और न चाहकर हम भी बदलते हैं। मगर बदलते जीवन में भी कुछ रिश्ते परिवर्तन के अतीत होते हैं। दिल उन्हीं रिश्तों को चाहता है।

हिंदी सिनेमा के नायक और नायिका अक्सर आदर्शवादी होते थे। मगर दिल चाहता है के तीनों नायकों में बहुत कमियां थीं। वक्‍त उनको बदलता है। फरहान अख्तर ने इस फिल्म के साथ हिंदी सिनेमा के व्याकरण के नियम ही बदल डाले। इसमें संवाद छोटे और यथार्थवादी थे। कोई फिल्मी हीरो की तरह नहीं बोल रहा था। भाषा में हिंदी और अंग्रेजी का सम्मिश्रण था। बोलचाल के साथ फिल्म में किरदारों के पहनावे भी नई सदी से तालमेल खा रहे थे।

दोस्ती को मिली नई मंजिल

अगर किसी के फोन में कोई ‘गोवा ट्रिप’ वाला वॉट्सऐप ग्रुप है, तो उसके लिए काफी हद तक दिल चाहता है को श्रेय दिया जा सकता है। यात्रा और प्रेम को एक सूत्र में बांध कर बहुत सारी ‘रोड फिल्में’ हिंदी सिनेमा में बनी है। चोरी चोरी (1956), बॉम्बे टू गोवा (1972) आदि। मगर वे सब प्रेम कहानियां थीं। दिल चाहता है ने सफर और दोस्ती को एक अविस्मरणीय गांठ में बांध दिया।

दिल चाहता है से पहले गोवा में ज्यादातर विदेशी पर्यटक या हिप्पी आते थे। कुछ हनीमून पर जाने वाले नवविवाहित दंपत्ति भी थे। पर 2001 के बाद सिद्धार्थ, आकाश और समीर की तरह युवा गोवा को पर्यटन स्थल से कहीं अधिक, दोस्ती का गवाह बनाना चाहते थे। आलम यह है कि आज भी युवा दोस्तों के साथ गोवा जरूर जाना चाहते हैं।

आज 25 साल बाद दिल चाहता है देखने पर कुछ सवाल मन में आते हैं। फिल्म में पूजा के मंगेतर सुबोध के तौर-तरीकों का मजाक उड़ाया गया है। पर जैसे-जैसे उस पीढ़ी के लड़कों की उम्र बढ़ती गई, ऐसा लगता है शायद सुबोध अपनी मंगेतर की हर छोटी-बड़ी बात की खबर रखता था और व्यवस्थित जीवन जीना पसंद करता था। आज ऐसे व्यक्ति को शायद ‘ग्रीन फ्लैग’ कहेंगे। अक्षय खन्ना और डिंपल कपाडिया शायद आज के समाज में कहीं न कहीं अपना मंज़र ढूंढ ही लेते।  इस बात की सराहना करनी चाहिए कि फरहान ने अपने वक़्त से आगे की कहानी कहने की कोशिश की। सराहना करनी चाहिए कि फरहान ने अपने वक्त से आगे की कहानी कहने की कोशिश की।

दिल चाहता है का आने वाले दो दशकों की फिल्मों पर भारी प्रभाव पड़ा। पारिवारिक दृष्टिकोण के स्थान पर अब सिनेमा व्यक्तिगत विकल्पों में अधिक रूचि लेने लगा। लाइफ इन अ मेट्रो (2007), वेक अप सिड (2009), जिंदगी न मिलेगी दोबारा (2011) और यह जवानी है दीवानी (2013) जैसी फिल्मों के किरदारों और कहानियों में यह दिखाई पड़ता है। अब किरदार परिवार और समाज के लिए कम और अपने लिए ज्यादा जीने लगे थे। इनका मसला गरीबी नहीं खुद का अंर्तद्वंद्व था। बेशक 25 साल बीत गए, मगर ऐसा लगता है, दिल चाहता है के किरदार और कहानी आज के समय की कहानी बयान कर रहे हैं।

This article was published in Outlook Hindi in September, 2026 to mark 25 years of Dil Chahta Hai

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